Monday, March 18, 2019

बहू या बेटी



सुशीला जी के घर में सुबह से ही गहमागहमी थी। विदेश में रहने वाले उनके बेटी-दामाद , दो वर्षों बाद होली पर घर आ रहे थे। बेटा सलिल उन्हें लेने एयरपोर्ट गया हुआ था और बहू श्वेता रसोईघर में तरह तरह के व्यंजन बनाने में लगी थी। उनके पति , मनोहर जी बाज़ार गये हुए थे । सुशीला जी ख़ुद अपनी पाँच माह की पोती की मालिश करने में व्यस्त थीं , जिससे वे उसको नहला धुला कर सुला सकें। उन्होंने श्वेता को आवाज़ लगाई “ बहू , ज़रा गुड़िया के कपड़े निकाल दे” थोड़ी देर में श्वेता , सिर पर पल्लू संभालते हुए आकर गुड़िया के कपड़े दे गई।
दरवाज़े पर घंटी बजी , और दरवाज़ा खुलते ही सोना , माँ कहते हुए आकर सुशीला जी से लिपट गई। बेटी को इतने समय बाद देख कर, सुशीला जी की आँखें भी ममता से छलक पड़ीं ।अपनी प्यारी ननद को देख श्वेता भी चहक उठी श्वेता को देख अनायास ही सोना बोल पड़ी , “ ये क्या भाभी ? आप साड़ी पहन कर , सिर पर पल्लू रख कर काम कैसे कर पाती हैं ? अब तो नन्हीं गुड़िया भी है , आपको परेशानी नहीं होती ?”श्वेता ने सोना के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और चुपचाप सबका नाश्ता लगाने लगी।
सुशीला जी ने सोना को प्यार से झिड़का ,” अरे ! तू आते ही किन बातों में उलझ गई बेटी....श्वेता इस घर की बहू है , तो बहू जैसी ही लगनी चाहिये...हमारे यहाँ बहुएँ हमेशा साड़ी पहनती हैं और सिर पर पल्लू भी रखती हैं....चल जल्दी से हाथ मुँह धो ले और दामाद जी को लेकर नाश्ता करने आजा “
दो दिन बाद होली थी , घर में तरह तरह के पकवान बन रहे थे। सोना जब भी अपनी भाभी का हाथ बटाना चाहती , सुशीला जी उसे टोक देतीं “ तू सालों बाद मायके आयी है बेटी , आराम कर , विदेश में तो तुझे सारे काम ख़ुद ही करने पड़ते हैं “ 
देखते ही देखते होली का दिन भी आ गया। सवेरे सवेरे श्वेता चाय लेकर मनोहर जी और सुशीला जी के कमरे में गई।उसको जींस और कुर्ते में देख , सुशीला जी ग़ुस्से से चीख़ पड़ीं “ त्योहार के दिन यह क्या रंग रूप बना रखा है बहू ? अपने सास-ससुर के सामने ऐसे कपड़ों में तुम्हें शर्म नहीं आती ? तभी पीछे से सोना आकर हँसते हुए बोली “ बुरा ना मानो होली है !! माँ , पापा , भाभी आप दोनों का हमेशा एक बेटी की तरह ख़्याल रखती हैं तो आप दोनों भी उन्हें बहू नहीं , बेटी ही समझिये....उन्हें भी वही आज़ादी दीजिये जो आप मुझे देते रहे हैं “
सोना की बातें सुनकर श्वेता मुस्कुरा दी और मन ही मन सोचने लगी कि सोना जैसी ननद ईश्वर सबको दें।” बहू , ज़रा मेरे लिये दहीबडे़ ले आना...तुमने बहुत स्वादिष्ट बनाये हैं “ मनोहर जी मुस्कुराते हुए बोले। “ बहू नहीं बेटी पापा “ श्वेता ने हँस कर जवाब दिया और रसोईघर की ओर चल पड़ी ।तभी पीछे से उसे सुशीला जी की आवाज़ सुनाई पड़ी “ बेटी , मेरे लिये भी “
सुशीला जी के घर में अचानक ही होली का माहौल ख़ुशनुमा हो गया था।


Sunday, March 17, 2019

बारिशों का मौसम

दोस्तों , आज सवेरे से ही मेरे शहर में खूब बारिश हो रही है , यानी कि भीगा भीगा रविवार.... इस सुहाने मौसम में मैंने भी लिख डालीं चंद पंक्तियाँ :) :)
“ बारिशों का मौसम “

फिर आया है आज बारिशों का मौसम , 
यादों में तुम्हारी डूबने उतराने का मौसम...
प्रेम की उन संकरी गलियों में...
फिर लौट जाने का मौसम !!             
धुले हरे साफ़ नाज़ुक पत्तों की तरह , 
                                                       बारिश की फुहारों में भीग जाने का मौसम                                                                                
गुज़रे हुए उन हसीन लमहो को
दोबारा जी लेने का मौसम !
    तुम्हारे ख़्यालों की ख़ुशबू में ,
    एक बार फिर महक जाने का मौसम !!
    तुम्हारी बाँहों की गरमाहट को...
    बस यूँ ही महसूस करने का मौसम !
   हक़ीक़त से कोसों दूर , सपनों की दुनिया में ,
   कल्पनाओं की ऊँची उड़ान भरने का मौसम , 
   जिन राहों पर कभी साथ चले थे हम....
   उन अनजान मंज़िलों को ढूँढने का मौसम !
   सोचती हूँ , जी लूँ पूरी तरह इन पलों को ,
  वरना फिर कहीं बदल न जाये.....
   तुम्हारी ही तरह ये सुहाना मौसम !!


                    तस्वीरें मेरे मोबाइल कैमरे में कैद नयनाभिराम लवासा से 





Friday, March 15, 2019

सुबह -ए-बनारस


दोस्तों , मेरा गृह नगर बनारस अर्थात काशी है। वही काशी , जो भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी है , जहाँ गंगा उत्तरवाहिनी हैं। भारत में सभी जगह गंगा उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर प्रवाहित होती हैं , जबकि काशी ही एक ऐसा स्थान है ,जहाँ गंगा का प्रवाह दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर है। बनारस पूरे विश्व में अपने घाटों के लिये प्रसिद्ध है , इन घाटों की संख्या चौरासी है। बनारस के घाट यूनेस्को द्वारा “विश्व धरोहर” के रूप में चिन्हित हैं । इन चौरासी घाटों में प्रत्येक घाट की अपनी कहानी है , जो मैं  आपको समय समय पर बताऊँगी।                                                                                         
 आज मैं बात करूँगी अस्सी घाट पर नियमित रूप से होने वाले कार्यक्रम “ सुबह-ए-बनारस की “
सुबह , जब भोर की रश्मियाँ धरती पर उतरती हैं , तो उनका स्वागत घंटे घड़ियालों से होता है। सजी हुई चौकियों पर पंडित , गंगा की आरती आरम्भ करते हैं । घंटे की आवाज़ों के बीच वे गंगा माँ की आरती पूरे विधि विधान  से की जाती हैं । इसी बीच सूर्योदय होता है और चारों ओर सुनहरी आभा बिखर जाती है। आरती के पश्चात , घाट पर बने मंडप में हवन होता है , जिसमें बिना किसी भेद-भाव के वहाँ पर उपस्थित सभी लोग आहुति डालते हैं। हवन के बाद सभी , गंगा माँ को जल अर्पित करते हैं । फिर आरम्भ होता है घाट पर बने मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रम ! किसी दिन बाँसुरी वादन की स्वर लहरियाँ गूँजती हैं तो किसी दिन शास्त्रीय गायन की । कभी कोई शास्त्रीय नृत्य होता है तो कभी सितार वादन। सूर्योदय की नयनाभिराम छटा , पक्षियों का कलरव और मंत्रमुग्ध करने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम मन में अलग सा उल्लास भर देते हैं । लगभग आधे घंटे के सांस्कृतिक कार्यक्रम के पश्चात बारी आती है योग की। योग गुरू प्रतिदिन योगाभ्यास कराते हैं और सभी को स्वस्थ रहने की प्रेरणा देते हैं।
हाँ , इसी बीच कुछ लड़के मसाला नींबू चाय बेचते हैं , जिसका अच्छा स्वाद लम्बे समय तक याद रह जाता है।
मेरे लिये “ सुबह-ए-बनारस “ एक अलौकिक और अविस्मरणीय अनुभव रहा है । उन अनुभूतियों को  और उस परम आनन्द को शब्दों में व्यक्त करना बहुत कठिन है।

आप भी जब बनारस जायें तो एक बार सुबह-ए-बनारस का अनुभव अवश्य लें।

Thursday, March 14, 2019

जीवन की साँझ

सवेरे सवेरे मैं नाश्ता बनाने में तथा बेटे ,बहू और पोते का टिफ़िन बनाने में व्यस्त थी तभी सूरज ने आवाज़ लगाई , सुनो एक प्याली चाय मिल सकती है क्या ? और ज़रा तौलिया निकाल दो तो नहा भी लूँ । उफ़्फ़ ! कोई काम ख़ुद भी कर लिया करो...मन ही मन मैं बुदबुदायी और गैस पर एक तरफ़ चाय बनाने के लिये पानी चढ़ा ही रही थी कि नन्हा रिशू आकर मेरे घुटनों से लिपट गया...दादी , मेरी टाई और बेल्ट ढूँढ दीजिये ना , नहीं मिल रही है....वरना मम्मा डाँटेंगी ।अब मैं गैस बन्द कर रिशू की टाई बेल्ट ढूँढने लगी। मेरी रोज़ की यही दिनचर्या है , पति , बेटे बहू एवं पोते के बीच चकरघिन्नी सी घूमती रहती हूँ और सभी की फ़रमाइशों को पूरा करते करते कब पूरा दिन निकल जाता है पता ही नहीं चलता ।
मेरे पति सूरज , बड़े सरकारी अफ़सर रह चुके हैं , अब सेवानृवित्ति के बाद हम अपने बेटे शशांक व बहू रीमा के साथ रहते हैं ।शशांक और रीमा दोनों ही ऑफ़िस जाते हैं और नन्हें रिशू ने अभी ही स्कूल जाना शुरू किया है । 
रिशू की टाई बेल्ट ढूँढ कर रसोई की तरफ़ जा ही रही थी , कि सूरज की आवाज़ कानों में पड़ी....क्या यार , अभी तक चाय नहीं बनी ? माँ हमारा नाश्ता लगा दो , कहते हुए शशांक भी डाइनिंग टेबल पर आ बैठा । “ माँ आज लंच में चपाती की जगह पराँठे रखियेगा” रीमा ने भी अपने कमरे से आवाज़ लगाई । 
शशांक , रीमा और रिशू को भेजने के बाद दो पल की फ़ुरसत मिली तो मैं भी अपने लिये चाय का प्याला लेकर बैठ गयी । चाय पीते हुए अचानक ही मेरी नज़र सामने लगे आइने पर पड़ी ।अपना अक्स आइने में देख मैं अचानक चौंक पड़ी....ओह ! कैसी लगने लगी हूँ मैं ? बेतरतीब कपड़े , बालों से झांकती सफ़ेदी और झुर्रियों से काला पड़ता चेहरा....सहसा अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ, क्या मैं वही हूँ जिसकी ख़ूबसूरती और गुणों की मिसालें दी जाती थीं । मुझे याद है , मेरी सासु माँ हर जगह बड़े गर्व से बताया करती थीं “ मैं अपने सूरज के लिये कितनी पढ़ी लिखी , सुन्दर और सुघड़ बहू ढूँढ कर लाई हूँ “अपना अनजाना सा अक्स आइने में देख मैंने एक निर्णय लिया। और फिर अन्य कामों में संलग्न हो गई ।
अगले दिन सुबह सुबह दरवाज़े पर दस्तक हुई तो रीमा ने दरवाजा खोला। सामने एक अनजान महिला को देख उसने मुझे आवाज़ लगाई....माँ आपने किसी को बुलाया है क्या ? मैंने भी अपने कमरे से उत्तर दिया , “ हाँ , काम वाली बाई है , उसको बता दो , लंच और नाश्ते में क्या बनेगा” तब तक रीमा , शशांक और सूरज मेरे कमरे में आ चुके थे।
मैंने उनकी प्रश्नवाचक निगाहों का उत्तर देते हुए कहा , आज से मैंने घर के कामों के लिये बाई रखने का निर्णय लिया है । “ पर माँ , आप फिर पूरा दिन बोर नहीं हो जायेंगी ? घर के कामों में आपका मन लगा रहता है “ रीमा झिझकते हुए बोली। मैंने उसे मुस्कुरा कर उत्तर दिया....तुम चिन्ता न करो बेटा , मैं आज बाज़ार से पेंटिंग का सामान लाऊँगी ।मैं अपने पेंटिंग और लिखने के शौक़ को फिर से ज़िन्दा करूँगी , जो जीवन की आपाधापी में कहीं बहुत पीछे छूट गये थे।
ये कहते हुए मेरी नज़रें सूरज से जा मिलीं ।उनकी आँखों में मेरे लिये स्नेह छलक रहा था , वे मुस्कुरा कर बोले....चाय पियोगी ? मैं अभी बना कर लाता हूँ । मैंने हाँ में सिर हिलाया और मन ही मन हँस पड़ी



Monday, March 11, 2019

चुनावों के मौसम में “ क़िस्सा कुर्सी का “



कुर्सी कुर्सी कहते कहते, जग उधराया जाए ,
जिसके हाथ ना आवे कुर्सी , वो सारी जुगत भिड़ाए !!
नेता हों या आम आदमी , कुर्सी सभी को भाए ,
कुर्सी की शान के आगे , सब फीका पड़ जाये !
कुर्सी से ,
हर कोई चाहे fevicol bonding ,बंधन कभी ना छूटे , 
साम , दाम , दंड , भेद , सब उपाय हैं छोटे !!
कुर्सी पर विराजने को सभी लम्बी दौड़ लगाते ,
कुछ के हाथ आती कुर्सी , कुछ हाथ मलते रह जाते !
कुर्सी की महिमा जान , हम भी बहुत ललचाये , 
लग गये बस जी जान से , क़िस्मत का ताला खुल जाये !!
लगन और मेहनत से हाथ आ गई चाभी , हम फूले ना समाये !
हम को भी मिल गई कुर्सी , हम शान से बैठे इतराये , 
आप सभी की दुआ चाहिये , कि बस कुर्सी हाथ से न जाये !! 








आप सभी के लिये मेरी पहली कविता , जो मुझे बेहद प्रिय है ।आशा है आपको भी पसन्द आयेगी

                        “ कविता “


यूँ तो आसां नहीं होता किसी कविता का बन जाना , 
हर वक़्त मुमकिन नहीं होता लफ़्ज़ों का आकार ले लेना !
दिल के दर्द जब पिघल कर बनते हैं शब्द....
तब होती है इक कविता मुकम्मल !
दिल के घाव जब नासूर बन रिसते हैं ,
तब होती है इक कविता मुकम्मल !
कहीं दूर तक अंधेरे गलियारों में 
यूँ ही बिना वजह भटकने के बाद ,
जब कहीं रोशनी आये नज़र , 
तब होती है इक कविता मुकम्मल !!
कभी कभी प्रेम रस से भीगे से 
लफ़्ज़ जब करते हैं अठखेलियाँ
तब होती है इक कविता मुकम्मल !
जब कभी ख़ुशियों की सौग़ात मिल जाए
और दिल के तार झंकृत हो जाएँ 
तब होती है इक कविता मुकम्मल !
जब कभी यादों की पोटली खुल जाए
और सोये किरदार बाहर निकल आएँ 

फिर होती है इक कविता मुकम्मल !!

बहू या बेटी

सुशीला जी के घर में सुबह से ही गहमागहमी थी। विदेश में रहने वाले उनके बेटी-दामाद , दो वर्षों बाद होली पर घर आ रहे थे। बेटा सलिल उन्हें...