सुशीला जी के घर में सुबह से ही गहमागहमी थी। विदेश में रहने वाले उनके बेटी-दामाद , दो वर्षों बाद होली पर घर आ रहे थे। बेटा सलिल उन्हें लेने एयरपोर्ट गया हुआ था और बहू श्वेता रसोईघर में तरह तरह के व्यंजन बनाने में लगी थी। उनके पति , मनोहर जी बाज़ार गये हुए थे । सुशीला जी ख़ुद अपनी पाँच माह की पोती की मालिश करने में व्यस्त थीं , जिससे वे उसको नहला धुला कर सुला सकें। उन्होंने श्वेता को आवाज़ लगाई “ बहू , ज़रा गुड़िया के कपड़े निकाल दे” थोड़ी देर में श्वेता , सिर पर पल्लू संभालते हुए आकर गुड़िया के कपड़े दे गई।
दरवाज़े पर घंटी बजी , और दरवाज़ा खुलते ही सोना , माँ कहते हुए आकर सुशीला जी से लिपट गई। बेटी को इतने समय बाद देख कर, सुशीला जी की आँखें भी ममता से छलक पड़ीं ।अपनी प्यारी ननद को देख श्वेता भी चहक उठी श्वेता को देख अनायास ही सोना बोल पड़ी , “ ये क्या भाभी ? आप साड़ी पहन कर , सिर पर पल्लू रख कर काम कैसे कर पाती हैं ? अब तो नन्हीं गुड़िया भी है , आपको परेशानी नहीं होती ?”श्वेता ने सोना के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और चुपचाप सबका नाश्ता लगाने लगी।
सुशीला जी ने सोना को प्यार से झिड़का ,” अरे ! तू आते ही किन बातों में उलझ गई बेटी....श्वेता इस घर की बहू है , तो बहू जैसी ही लगनी चाहिये...हमारे यहाँ बहुएँ हमेशा साड़ी पहनती हैं और सिर पर पल्लू भी रखती हैं....चल जल्दी से हाथ मुँह धो ले और दामाद जी को लेकर नाश्ता करने आजा “
दो दिन बाद होली थी , घर में तरह तरह के पकवान बन रहे थे। सोना जब भी अपनी भाभी का हाथ बटाना चाहती , सुशीला जी उसे टोक देतीं “ तू सालों बाद मायके आयी है बेटी , आराम कर , विदेश में तो तुझे सारे काम ख़ुद ही करने पड़ते हैं “
देखते ही देखते होली का दिन भी आ गया। सवेरे सवेरे श्वेता चाय लेकर मनोहर जी और सुशीला जी के कमरे में गई।उसको जींस और कुर्ते में देख , सुशीला जी ग़ुस्से से चीख़ पड़ीं “ त्योहार के दिन यह क्या रंग रूप बना रखा है बहू ? अपने सास-ससुर के सामने ऐसे कपड़ों में तुम्हें शर्म नहीं आती ? तभी पीछे से सोना आकर हँसते हुए बोली “ बुरा ना मानो होली है !! माँ , पापा , भाभी आप दोनों का हमेशा एक बेटी की तरह ख़्याल रखती हैं तो आप दोनों भी उन्हें बहू नहीं , बेटी ही समझिये....उन्हें भी वही आज़ादी दीजिये जो आप मुझे देते रहे हैं “
सोना की बातें सुनकर श्वेता मुस्कुरा दी और मन ही मन सोचने लगी कि सोना जैसी ननद ईश्वर सबको दें।” बहू , ज़रा मेरे लिये दहीबडे़ ले आना...तुमने बहुत स्वादिष्ट बनाये हैं “ मनोहर जी मुस्कुराते हुए बोले। “ बहू नहीं बेटी पापा “ श्वेता ने हँस कर जवाब दिया और रसोईघर की ओर चल पड़ी ।तभी पीछे से उसे सुशीला जी की आवाज़ सुनाई पड़ी “ बेटी , मेरे लिये भी “
सुशीला जी के घर में अचानक ही होली का माहौल ख़ुशनुमा हो गया था।





